व्यायाम जरूरी है अधेड़ लोगों के लिये

युवावस्था में प्रायः स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां कम होती हैं। ज्यों-ज्यों आयु बढ़ती है, मन तो युवा बनता रहता है किंतु शरीर में कई प्रकार के परिवर्तन आने लगते हैं। आयु के प्रभाव के कारण शरीर के विभिन्न अंगों व जोड़ों में कई प्रकार के परिवर्तन धीरे-धीरे आते हैं।
ये परिवर्तन इतनी धीमी गति से आते हैं कि जब कोई बड़ी समस्या आती है तो व्यक्ति हैरान रह जाता है। अधेड़ावस्था में स्वस्थ बने रहने के लिए हमें ंयह ज्ञान होना चाहिए कि बेहतरी के लिए क्या करें और क्या न करें।
इस आयु की अधिकतर खतरनाक बीमारियों का कारण मोटापा है। आयु बढ़ने के साथ शरीर में व्यायाम का स्तर कम हो जाता है किंतु भोजन वही बना रहता है जिससे शरीर में चर्बी जमनी आरंभ हो जाती है और वज़न बढ़ जाता है। इससे शरीर के विभिन्न जोड़ों पर जोर पड़ता है जिससे जोड़ों का दर्द प्रारंभ हो जाता है। यह चर्बी हृदय और दिमाग की रक्तवाहिनी नलिकाओं में भी जमती है जिससे कई बार हृदयाघात या पक्षाघात हो सकता है।
मधुमेह इस आयु की एक आम बीमारी है। प्रायः यह वर्ष की आयु के आसपास होती है। मधुमेह धीमा ज़हर है और यह शरीर के हर अंग पर प्रभाव डालता है, जिससे हृदयाघात, स्ट्रोक, गुर्दा फेल होना, अंधत्व या अन्य कई प्रकार की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

मधुमेह के साथ या इसके अतिरिक्त प्रायः उच्च रक्तचाप की समस्या भी पैदा हो जाती है जो रक्तवाहक नलिकाओं के संकरे हो जाने के कारण होती है। इसका प्रभाव भी हृदय, दिमाग, गुर्दों और शरीर के अन्य अंगों पर पड़ता है। इससे बचाव हेतु समय-समय पर रक्तचाप की जांच करवाते रहना चाहिए और डाॅक्टर की सलाह से खान-पान में सुधार कर दवाइयों के प्रयोग द्वारा इसे काबू में रखना चाहिए।
इस आयु की एक और बड़ी समस्या प्रोस्टेट ग्लैंड का बढ़ जाना है। प्रोस्टेट एक ग्लैंड होता है जो मूत्रानली के इर्द-गिर्द होता है। प्रायः 40 वर्ष की आयु के पश्चात यह बढ़ना प्रारंभ हो जाता है, जिससे मूत्रा नली संकरी हो जाती है।
इससे रात को बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता है और नींद खराब होने से शरीर में लगातार थकान और उत्साहहीनता की स्थिति आ जाती है।
पेशाब की धार धीरे-धीरे कम होती जाती है किंतु यह इतनी धीमी गति से होता है कि मरीज़ को पता ही नहीं चलता कि उसे मूत्रा त्याग करने में अधिक समय लग रहा है। कई बार तो मरीज़ का अपने मूत्रा पर काबू नहीं रहता।
इसका समय पर इलाज न किया जाए तो गुर्दे फेल होने की स्थिति भी आ सकती है। इस बीमारी का किसी भी अच्छे सर्जन को दिखाकर और अल्ट्रासाउंड जैसे टेस्ट कराकर पता लगाया जा सकता है। आजकल इन अधेड़ावस्था की बीमारियों का इलाज पहले से काफी आसान हो गया है। पहले सर्जन पेट को काट कर प्रोस्टेट ग्लैंड को निकाल दिया करते थे किंतु अब एक नई प्रकार की सर्जरी जिसे टीयूआरपी भी कहते हैं, का प्रयोग किया जाता है।
इससे मूत्रा नली द्वारा तार डालकर टेलीस्कोप के माध्यम से देखकर प्रोस्टेट में हुई वृद्धि को हटा दिया जाता है। इसमें मरीज़ को पूरा बेहोश करने की आवश्यकता नहीं होती और तीन दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है।
आयु बढ़ने के साथ देखने और सुनने की इंद्रियों पर भी प्रभाव पड़ता है। प्रायः इस आयु में सफेद व काले मोतियाबिंद की शिकायत हो जाती है।
इसका आॅपरेशन बहुत आसान है और अस्पताल से उसी दिन छुट्टी मिल जाती है। श्रवण शक्ति कम होने से व्यक्ति स्वयं को समाज से कटा हुआ महसूस करने लगता है। एक छोटी-सी ‘हियरिंग एड’ का प्रयोग कर इस अकेलेपन से मुक्ति पाई जा सकती है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है हल्का भोजन और नियमित योगासन या व्यायाम जिससे शरीर को स्वस्थ बनाए रखा जा सकता है।
समय पर मेडिकल चैकअप करवाने से भी बहुत-सी बीमारियों से बचा जा सकता है।

